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संस्कृति और विरासत

पृथ्वीराज चौहान का दुर्ग

पृथ्वीराज चौहान का दुर्गइस विशाल दुर्ग का निर्माण दिल्ली के आखिरी हिन्दू शासक एवं पृथ्वीराज चौहान के चचेरे चाचा राय पीथोरा द्वारा करवाया गया। ऐसा कहा जाता है कि यह दुर्ग पृथ्वीराज चैहान को भेंट स्वरूप् मिला था, जिसे बाद में मोहम्मद गोरी द्वारा ध्वस्त कर दिया गया था। 1857 में ब्रिटिश सेना की यह छावनी और जेल थी। हिसार जिले में 1857 की जनक्रांति का बिगुल सर्वप्रथम 29 मई को हांसी में बजा था। सन् 1982 में इस किले से जैन तीर्थाकरों की 57 अष्ट धातुओं से बनी प्रतिमाएं प्राप्त हुई थी।

 

बड़सी दरवाजा

बड़सी दरवाजायह दरवाजा हांसी का ही नहीं, बल्कि हरियाणा की शान है व राष्ट्रीय स्तर के समारकों में से एक है। दरवाजे के निर्माण में वास्तुकला के साथ ही सौंदर्य कला व तकनीक का बड़ी सूक्ष्मता से ध्यान रखा गया था। कलात्मक रूप देने के लिए इसके अग्र भाग पर दोनों ओर हिंदू स्थापत्य कला के प्रतीक पूर्ण विकसित कमल पुष्प, राजस्थानी मेहराब, सजावटी खिड़कियां व झरोखे भी बने हुए हैं। सम्राट पृथ्वी राज भट्ट द्वारा बनवाए जाने संबधी एक शिलालेख इसके अग्र भाग पर अंकित है। एक अन्य शिलालेख, जिसमें सुलतान अलाउद्दीन खिलजी को बड़सी दरवाजे का निर्माता कहा गया है। इसके अनुसार अलाउद्दीन खिलजी ने सन् 1303 ई0 में इसका निर्माण करवाया था।

 

दरगाह चार कुतुब

दरगाह चार कुतुबहांसी शहर के पश्चिम की तरफ स्थित यह प्राचीन स्मारक चार कुतुब की दरगाह के नाम से प्रसिद्ध है। जमालुद्दीन हांसी (1187-1261) बुरहानुद्दीन (1261-1300) कुतुबउद्दीन मुनव्वर (1300-1303) और रूकनूद्दीन (1325-1397) अपने समय के महान सूफी संत थे और इन्हें कुतुब का दर्जा हासिल था। ऐसा कहा जाता है कि यह दरगाह उसी स्थान पर है जहां बाबा फरीद ध्यान और प्रार्थना किया करते थे। इस दरगाह के उतरी दिशा में एक गुबंद का निर्माण सुलतान फिरोजशाह तुगलक ने करवाया था। मुगल बादशाह हुमांयू जब अपनी सल्तनत खो बैठा तो उसने दरगाह में आकर दुआ की थी।
इसे यह भी गौरव प्राप्त है कि यहां एक ही परिवार के लगातार चार सूफी संतों की मजार एक ही छत के नीचे है, इसलिए इसका नाम दरगाह चार कुतुब है। यह कहा जाता है कि यदि यहां पांच कुतुब बन जाते तो यह मक्का के स्तर का पवित्र स्थान बन जाता।