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इतिहास

हाँसी का इतिहास अत्यंत प्राचीन और वीरतापूर्ण है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसकी स्थापना राजा सहस्रबाहु ने की थी, परंतु ऐतिहासिक रूप से इसे पृथ्वीराज चौहान के मजबूत गढ़ के रूप में जाना जाता है। यहाँ का असीगढ़ किला, जिसे ‘तलवारों का किला’ भी कहा जाता है, उत्तर-पश्चिम से होने वाले आक्रमणों के विरुद्ध दिल्ली की रक्षा के लिए एक अभेद्य दीवार माना जाता था। 12वीं शताब्दी के अंत में मुस्लिम शासन की स्थापना के बाद, हाँसी एक प्रमुख प्रशासनिक केंद्र और सूफी मत का बड़ा ठिकाना बना, जिसकी गवाही यहाँ की प्रसिद्ध ‘चार कुतुब’ दरगाह आज भी देती है।

मध्यकाल के बाद हाँसी के इतिहास में एक अनोखा मोड़ तब आया जब 18वीं शताब्दी के अंत में आयरिश साहसी जॉर्ज थॉमस ने इसे अपनी स्वतंत्र रियासत की राजधानी बनाया और यहाँ अपना सिक्का ढाला। हालाँकि, हाँसी की शौर्य गाथा का सबसे भावुक अध्याय 1857 की क्रांति से जुड़ा है। यहाँ के स्थानीय वीरों ने अंग्रेजों के खिलाफ जबरदस्त विद्रोह किया था, जिसके प्रतिशोध में ब्रिटिश सेना ने क्रांतिकारियों को सड़क पर लिटाकर रोड रोलर से कुचल दिया था। इस बलिदान की याद में वह स्थान आज भी ‘लाल सड़क’ के नाम से जाना जाता है। आज हाँसी अपनी ऐतिहासिक विरासतों, जैसे बरसी गेट और असीगढ़ किले के अवशेषों के साथ-साथ अपने विश्वप्रसिद्ध ‘लाल पेड़े’ के लिए भी पहचाना जाता है।